(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 13 अनुशासनपर्व


॥ श्रीः ॥
13.16. अध्यायः 016
अथ दानधर्मपर्व ॥ 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरंप्रति भगवन्महिमप्रतिपादकव्यासवचनानुवादः॥ 1 ॥


Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Text

`भीष्म उवाच।

द्वारकायां यथा प्राह पुराऽयं मुनिसत्तमः।
वेदविप्रमयत्वं तु वासुदेवस्य तच्छृणु॥ 13-16-1(81757)
यूपं विष्णुं वासुदेवं विजान-
न्सर्वान्विप्रान्बोधते तत्वदर्शि।
विष्णुं क्रान्तं वासुदेवं विजान-
न्विप्रो विप्रत्वं गच्छते तत्वदर्शी॥ 13-16-2(81758)
विष्णुर्यज्ञस्त्विज्यते चापि विष्णुः
कृष्णो विष्णुर्यश्च कृत्स्नः प्रभुश्च।
कृष्णो वेदाङ्गं वेदवादाश्च कृष्ण
एवं जानन्ब्राह्मणो ब्रह्म एति॥ 13-16-3(81759)
स्थानं सर्वं वैष्णवं यज्ञमार्गे
चातुर्होत्रं वैष्णवं तत्र कृष्णः।
सर्वैर्भावैरिज्यते सर्वकामैः
पुण्याँल्लोकान्ब्राह्मणाः प्राप्नुवन्ति॥ 13-16-4(81760)
सोमं सद्भावाद्ये च जातं पिबन्ति
दीप्तिं कर्म ये विदानाश्चरन्ति।
एकान्तमिष्टं चिन्तयन्तो दिविस्था-
स्ते वै स्थानं प्राप्नुवन्ति व्रतज्ञाः॥ 13-16-5(81761)
ओमित्येतद्ध्यायमानो न गच्छे-
द्दुर्गं पन्थानं पापकर्मापि विप्रः।
सर्वं कृष्णं वासुदेवं हि विग्राः
कृत्वा ध्यानं दुर्गतिं न प्रयान्ति॥ 13-16-6(81762)
आज्यं यज्ञः स्रुक्स्रुवौ यज्ञदाता
इच्छा पत्नी पत्निशाला हवींषि।
इध्याः पुरोडाशं सर्वदा होतृकर्ता
कृत्स्नं विष्णुं संविजानंस्तमेति॥ 13-16-7(81763)
योगेयोगे कर्मणां चाभिहारे
युक्ते वैताने कर्मणि ब्राह्मणस्य।
पुष्ट्यर्थेषु प्राप्नुयात्कर्मसिद्धिं
शान्त्यर्थेषु प्राप्नुयात्सर्वशान्तिम्ट'॥ ॥ 13-16-8(81764)

इति श्रीमन्महाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि षोडशोऽध्यायः॥ 16 ॥


Mahabharat- Hindi (Devanagari) 100000 shlokas

www.sanatanadharm.com - play store app (sanatana dharm)

"Bharathiya Sanatana Dharm" and Sanatana Dharmam & Dharmo rakshati Rakshitha logo are our trademarks. Unauthorised use of "Sanatana Dharmam & Dharmo rakshoati Rakshitha" and the logo is not allowed. Copyright © sanatanadharm.com All Rights Reserved . Made in India.